Sunday, 22 June 2014

प्रिय दोस्तों,

आजादी के बाद देश की एकता, अखंडता के लिए प्रथम बलिदानी योद्धा और भारतीय जनसंघ के संस्थापक को बलिदान दिन पर शत-शत नमन...

डॉ.श्यामाप्रसाद मुखर्जी (Dr. Shyama Prasad Mukherjee) महान शिक्षाविद, चिन्तक होने के साथ साथ भारतीय जनसंघ के संस्थापक भी थे, जिन्हें आज भी एक प्रखर राष्ट्रवादी और कट्टर देशभक्त (Patriot) के रूप में याद किया जाता है. 6 जुलाई, 1901 को कोलकाता (Kolkata) के अत्यन्त प्रतिष्ठित परिवार में जन्में डॉ॰ श्यामाप्रसाद मुखर्जी (Dr.Shyama Prasad Mukherjee) जी के पिता श्री आशुतोष मुखर्जी (Ashutosh Mukherjee) बहुमुखी प्रतिभा के धनी एवं शिक्षाविद् के रूप में विख्यात थे. बाल्यावस्था से ही उनकी अप्रतिम प्रतिभा की छाप दिखने लग गई थी. कुशाग्र बुद्धि और प्रतिभा सम्पन्न डॉ मुखर्जी ने 1917 में मैट्रिक तथा 1921 में बी ए की उपाधि प्राप्त की, जिसके पश्चात् 1923 में उन्होंने लॉ (Law) की उपाधि अर्जित की और 1926 में वे इंग्लैण्ड (England) से बैरिस्टर बन स्वदेश लौटे. उन्होंने अपने ज्ञान और विचारों से तथा तात्कालिक परिदृश्य की ज्वलंत परिस्थितियों का इतना सटीक विश्लेषण किया कि समाज के हर वर्ग और तबके के बुद्धिजीवियों को उनकी बुद्धि का कायल होना पड़ा. अपनी कुशाग्र बुद्धिमत्ता का परिचय देते हुए मात्र 33 वर्ष की अल्पायु में उन्होंने कोलकाता विश्वविद्यालय (Kolkata University) के कुलपति का पदभार संभालने की जिम्मेदारी उठा ली.

जल्द ही उन्होंने तत्कालीन शासन व्यवस्था और सामाजिक-राजनैतिक परिस्थितियों के विशद जानकार के रूप में समाज में अपना एक विशिष्ट स्थान बना लिया था. एक राजनैतिक दल (Political Party) की मुस्लिम तुष्टिकरण नीति (Muslim Appeasement Policy) के कारण जब बंगाल (Bengal) की सत्ता मुस्लिम लीग (Muslim League) की गोद में डाल दी गई और 1938 में आठ प्रदेशों में अपनी सत्ता छोड़ने की आत्मघाती और देश विरोधी नीति अपनाई गई तब डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने स्वेच्छा से देशप्रेम और राष्ट्रप्रेम का अलख जगाने के उद्देश्य से राजनीति में प्रवेश किया.

डॉ मुखर्जी सच्चे अर्थों में मानवता (Humanity) के उपासक और सिद्धांतों के पक्के इंसान थे. संसद में उन्होंने सदैव राष्ट्रीय एकता (National Integrity) की स्थापना को ही अपना प्रथम लक्ष्य रखा. संसद में दिए अपने भाषण में उन्होंने पुरजोर शब्दों में कहा था कि राष्ट्रीय एकता के धरातल पर ही सुनहरे भविष्य की नींव रखी जा सकती है.

उस समय जम्मू काश्मीर (Jammu-Kashmir) का अलग झंडा था, अलग संविधान (Constitution) था. वहां का मुख्यमंत्री (Chief Minister) प्रधानमंत्री (Prime minister) कहलाता था. लेकिन डॉ मुखर्जी जम्मू कश्मीर को भारत का पूर्ण और अभिन्न अंग बनाना चाहते थेजिसके लिए उन्होंने जोरदार नारा भी बुलंद किया कि – एक देश में दो निशान, एक देश में दो प्रधान, एक देश में दो विधान नहीं चलेंगे, नहीं चलेंगें. अगस्त 1952 में जम्मू की विशाल रैली में उन्होंने अपना संकल्प व्यक्त किया था कि “या तो मैं आपको भारतीय संविधान प्राप्त कराऊंगा या फिर इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए अपना जीवन बलिदान कर दूंगा’’. जम्मू कश्मीर (Jammu-kashmir) में प्रवेश करने पर डॉ. मुखर्जी को 11 मई, 1953 को शेख अब्दुल्ला (Shekh Abdulla) के नेतृत्व वाली सरकार ने हिरासत में ले लिया था. क्योंकि उन दिनों कश्मीर में प्रवेश करने के लिए भारतीयों को एक प्रकार से पासपोर्ट (Passport) टाइप का परमिट लेना पडता था और डॉ मुखर्जी बिना परमिट (Permit) लिए जम्मू कश्मीर चले गए थे. जहां उन्हें गिरफ्तार कर नजरबंद कर लिया गया और वहां गिरफ्तार होने के कुछ दिन बाद ही 23 जून, 1953 को रहस्यमय परिस्थितियों में उनकी मृत्यु हो गई.

वे भारत के लिए शहीद हो गए और भारत ने एक ऐसा व्यक्तित्व (Personality) खो दिया जो राजनीति को एक नई दिशा दे सकता था. डॉ मुखर्जी इस धारणा के प्रबल समर्थक थे कि सांस्कृतिक दृष्टि (Cultural Aspect) से हम सब एक हैं, इसलिए धर्म के आधार पर किसी भी तरह के विभाजन (Division) के वे सख्त खिलाफ थे. उनका मानना था कि आधारभूत सत्य यह है कि हम सब एक हैं, हममें कोई अंतर नहीं है. हमारी भाषा एक है हमारी संस्कृति एक है और यही हमारी विरासत है. लेकिन उनके इन विचारों और उनकी मंशाओं को अन्य राजनैतिक दलों के तात्कालिक नेताओं ने अन्यथा रूप से प्रचारित-प्रसारित किया. लेकिन इसके बावजूद लोगों के दिलों में उनके प्रति अथाह प्यार और समर्थन बढ़ता गया.

भारतीय इतिहास में उनकी छवि एक कर्मठ और जुझारू व्यक्तित्व वाले ऐसे इंसान की है जो अपनी मृत्यु के इतने वर्षों बाद भी अनेक भारतवासियों के आदर्श और पथप्रदर्शक हैं.

Tuesday, 17 June 2014

प्रिय दोस्तों,

२३ जुन डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी का बलिदान दिन हैं और भारतीय जनता युवा मोरचा गुजरात प्रदेश हर साल रक्तदान करके देश के शहीदवीर डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी की जिन्होंने कश्मीर को बचाने के लिए अपना बलिदान दिया उनको श्रधांजलि अर्पित करता हैं |

रक्तदान जीवनदान है। हमारे द्वारा किया गया रक्तदान कई जिंदगियों को बचाता है। इस बात का अहसास हमें तब होता है जब हमारा कोई अपना खून के लिए जिंदगी और मौत के बीच जूझता है। उस वक्त हम नींद से जागते हैं और उसे बचाने के लिए खून के इंतजाम की जद्दोजहद करते हैं।

अनायास दुर्घटना या बीमारी का शिकार हममें से कोई भी हो सकता है। आज हम सभी शिक्षि‍त व सभ्य समाज के नागरिक है, जो केवल अपनी नहीं बल्कि दूसरों की भलाई के लिए भी सोचते हैं तो क्यों नहीं हम रक्तदान के पुनीत कार्य में अपना सहयोग प्रदान करें और लोगों को जीवनदान दें।

कौन कर सकता है रक्तदान :
* कोई भी स्वस्थ व्यक्ति जिसकी आयु 18 से 68 वर्ष के बीच हो।
* जिसका वजन 45 किलोग्राम से अधिक हो।
* जिसके रक्त में हिमोग्लोबिन का प्रतिशत 12 प्रतिशत से अधिक हो।

आओ हम सभी युवा मानवजीवन बचाने के इस महाँ अभियान में आगे आए और ज्यादा से ज्यादा रक्तदान करवाए और खुद भी रक्तदान करे |

- आप सबका
निलेश राजगोर
प्रदेश कन्वीनर:प्रशिक्षण सेल, भारतीय जनता युवा मोर्चो, गुजरात प्रदेश.

Thursday, 5 June 2014

પ્રિય મિત્રો,

આપ સૌ જાણો છો તેમ આજે ૫ જુન વિશ્વ પર્યાવરણ દિવસ છે જેની ઉજવણી વિશ્વભરમાં થઇ રહી છે. આજના આ પર્યાવરણ દિવસે પર્યાવરણ માટે કામ અને ચિંતા કરતા સૌ કાર્યકર્તાઓ, સંસ્થાઓને હું દિલથી અભિનંદન આપું છુ.

મિત્રો, જે રીતે વિશ્વનું પર્યાવરણ જોખમાઈ રહ્યું છે તે રીતે સમગ્ર માનવજાત નું અસ્તિત્વ પણ જોખમમાં છે અને જેના અનુભવો આપણે સૌ કરી રહ્યા છીએ. જેમ કે ઋતુચક્રમાં બદલાવ, ભયંકર વાવાઝોડા, સુનામી, પુર, દુકાળ, ભયંકર ગરમી, સમુદ્રની સપાટી ઝડપથી વધવી, અનેક જાતિ-પ્રજાતિઓ લુપ્ત થવી વગેરે ગ્લોબલ વોર્મિંગના ભયંકર પરિણામોનો અણસાર આપી રહ્યા છે જે માનવસમાજ માટે ચેતાવણી છે.

માલદીવ ટાપુ જે સમગ્ર દુનિયામાં કુદરતી સૌન્દર્ય માટે જાણીતો છે જે આપણી નજર સમક્ષ ડુબવા તરફ જઈ રહ્યો છે અને વિશ્વના બીજા ટાપુ દેશો ફીજી, રિકો, પાલાઉ, પોર્ટુ વગેરે પણ દરિયાની વધતી સપાટી થી ચિતિત છે ત્યારે વિકાસની આંધળી દોટમાં પર્યાવરણને જો નહિ જાળવીએ તો આવનારા થોડા વર્ષોમાં વિશ્વના દરિયાકિનારાના અનેક નગરો પણ દરિયામાં ડૂબી જશે. ટૂંકમાં કુદરતની માનવસમાજને પર્યાવરણ જાળવવાની ચેતવણી છે જેને આપણે ગંભીરતાથી લઇને ખરા અર્થમાં કામ કરવું પડશે.

આવો આપણે સૌ ૫ જુન વિશ્વ પર્યાવરણ દિવસ ના સંકલ્પ કરીએ કે નાના-નાના પગલાઓ ઉઠાવીએ જેવા કે વધુમાં વધુ વ્રુક્ષો વાવીએ, વ્રુક્ષો કપાતા અટકાવીએ, પ્રદુષણ ઓછુ કરીએ, વીજળી બચાવીએ, વસ્તી-વધારો અટકાવીએ વગેરેમાં શરૂઆત આપણાથી કરીએ અને આપણા જ અસ્તિત્વ માટે પૃથ્વીને બચાવીએ.

અને છેલ્લે મહાત્મા ગાંધીએ કીધેલી પંક્તિઓ દ્વારા આપ સૌને વિચાર કરવા વિનંતી.

"યહ ધરતી સમગ્ર સૃષ્ટી કી ભૂખ મીટા સકતી હૈ પરંતુ લોભ કો નહી,
ઔર હમ ભૂખ કો છોડકર લોભ કે પીછે ભાગ રહે હૈ "

- આપ સૌનો નીલેશ રાજગોર

Tuesday, 20 May 2014

प्रिय दोस्तों,

आज नरेन्द्र मोदीजी बीजेपी संसदीय दल के नेता चुने गए और उन्होंने संसद और देश को जो संदेश दिया तो लगा की सही में भारत के अच्छे दिन आ गए.

आज़ादी के बाद एक ऐसा नेता मिला हैं जो सही में अपनी मातृभूमि भारतमाँ को आज़ाद करवायेगा और गौरव दिलाएगा.

उनका संदेश आप खुद ही पढ़े....

संसदीय दल की बैठक में सर्वसम्मति से नेता चुने जाने के बाद भावुक हुए नरेंद्र मोदी ने कहा, 'मैं आप सबका बहुत आभारी हूं. आपने सर्वसम्मति से मुझे एक नया दायित्व दिया है. मैं विशेष रूप से आडवाणी जी और राजनाथ जी का आभारी हूं. उन्होंने मुझे आशीर्वाद भी दिए हैं. मैं सोच रहा था कि अटल जी का स्वास्थ अच्छा होता और आज वह यहां होते तो सोने पर सुहागा होता.

उनका आशीर्वाद सदा हम पर बना रहेगा. यह लोकतंत्र का मंदिर है. हम यहां बैठकर पूरी पवित्रता के साथ पद के लिए नहीं सवा सौ करोड़ देशवासियों की आशाओं को समेटकर बैठे हैं. इसलिए पदभार जीवन में बहुत बड़ी बात होती है, ऐसा मैंने कभी माना नहीं. लेकिन कार्यभार जिम्मेवारी ये सबसे बड़ी बात होती है. हमें उसे परिपूर्ण करने के लिए अपने आपको सज्ज करना होगा. अपने आपको समर्पित करना होगा.

13 सितंबर को मेरे लिए जिम्मेदारी तय हुई. 15 सितंबर से मैंने अपना काम शुरू किया. पूरी तरह मन में एक कार्यकर्ता के भाव से जब संगठन दायित्व देता है तो शरीर का प्रत्येक कण, समय का प्रत्येक बल, पार्टी के दायित्व को पूरा करने में कोई कसर नहीं छोड़नी चाहिए, ये संस्कार मिले हैं. इसलिए 15 सितंबर से जो परिश्रम यज्ञ शुरू किया और 10 मई को जब प्रचार खत्म हुआ. मैंने अध्यक्ष जी को फोन किया. कहा अहमदाबाद जाने से पहले दिल्ली आकर आपसे मिलना चाहता हूं. उन्होंने कहा कि थके नहीं हो अभी. मैंने कहा कि मुझे रिपोर्ट करना है. मेरे अध्यक्ष ने मुझे जो काम दिया, उसके बारे में बताना है. वह संकोच कर रहे थे. हंस भी पड़े. मैंने कहा, मैं आ रहा हूं. पूर्वी उत्तर प्रदेश में था. दिल्ली पहुंचा, उनके पास गया. और एक अनुशासित सिपाही की तरह मेरे अध्यक्ष को मैंने रिपोर्ट किया.

13 सितंबर से 10 मई तक आपने जो काम दिया था, वह भलीभांति करने की कोशिश की. एक कार्यक्रम नहीं हो पाया. वह मेरी तरफ देखते रहे. मैं इतने दिनों से दौड़ रहा हूं. लेकिन 9 मई को हुई इतनी सारी दौड़ धूप के बीच सिर्फ एक कार्यक्रम कैंसिल करना पड़ा. वह भी घोसी का. जहां पर हमारे जिलाध्यक्ष जो रैली की चिंता कर रहे थे, सुशील राय अकस्मात उनकी मृत्यु हो गई. लेकिन एक कार्यकर्ता के नाते इस पवित्र धरती पर भी आपको रिपोर्ट करता हूं, मैंने जो काम दिया उसे पूरा करने का प्रयास किया. फिर भी कुछ कमी रही हो. आपमें से कुछ लोग होंगे, जिनकी अपेक्षा होगी मगर मैं पहुंच नहीं पाया. मगर न पहुंचने का फैसला सही था क्योंकि आप यहां पहुंच गए. मुझे भरोसा था कि मैं यहां आया हूं.

जैसा बताया गया, पहली बार यहां आया हूं. जीवन में ऐसा हुआ.

मुख्यमंत्री बनने के बाद सीएम का चैंबर और विधानसभा गृह देखा. आज भी ऐसा ही अवसर आया है. लेकिन हम इस ऐतिहासिक स्थान पर बैठे हैं.

आज मैं देश के सभी महापुरुषों को प्रणाम करता हूं. संविधान निर्माताओं को प्रणाम. उन्हीं की बदौलत दुनिया को लोकतंत्र की ताकत का परिचय हो रहा है. इन दिनों जब विदेश के महानुभावों से बात होती है कि 550 मिलियन वोटर. उन्हें आश्चर्य होता है.ये संविधान की ताकत है. एक गरीब परिवार का व्यक्ति, आज यहां खड़ा हुआ है.

इस चुनाव में भारतीय जनता पार्टी का जय, किसी का पराजय ये अलग विषय है. मगर इस चुनाव में भारत का सामान्य से सामान्य से नागरिक एक नए आत्मविश्वास के साथ उठ खड़ा हुआ कि यही एक व्यवस्था है, जो हमारे सपनों को पूरा कर सकती है. लोकतंत्र के प्रति उसकी आस्था बढ़ी है. ये किसी भी राष्ट्र के लिए बहुत बड़ी ताकत होती है.

आखिरकर सरकार किसके लिए. सरकार वो हो, जो गरीबों के लिए सोचे. जो गरीबों को सुने. जो गरीबों के लिए जिए.

और इसलिए नई सरकार देश के गरीबों को समर्पित है. देश के कोटि कोटि युवकों को समर्पित है. और मान सम्मान के लिए तरसती हमारी मां-बहनों को समर्पित है. गांव हो, गरीब हो, पीड़ित हो, वंचित हो, ये सरकार उनके लिए है. हमें गरीब से गरीब आदमी ने यहां भेजा है. मैंने हिंदुस्तान के एक नए रूप को देखा है चुनाव प्रचार अभियान में. रैलियों में भी एक नया कलेवर देख रहा था. ऐसे लोग, जिनके शरीर पर एक ही कपड़ा था, फिर कंधे पर भाजपा का झंडा देख रहा था. ये तबका कितनी आशाओं के साथ हमारे पास आया है. इसलिए हमारे सपने हैं, उनके सपनों को सच करने के लिए.

भाइयों बहनों. आडवाणी जी ने एक शब्द प्रयोग किया. मैं आडवाणी जी से प्रार्थना कर रहा हूं कि वह इस शब्द का उपयोग न करें. उन्होंने कहा, नरेंद्र भाई ने कृपा की. (नरेंद्र मोदी रोने लगे)

क्या मातृ सेवा कभी कृपा हो सकती है. कतई नहीं हो सकती. जैसे भारत मेरी मां है. वैसे ही भाजपा भी मेरी मां है. और इसलिए बेटा कभी मां पर कृपा नहीं कर सकता. बेटा सिर्फ समर्पित भाव से मां की सेवा कर सकता है.

देश आजाद हुआ. जितनी भी सरकारें आईं, सबने अपनी अपनी तरह से देश को आगे बढ़ाने का प्रयास किया. जो अच्छा हुआ, उसके लिए वे सरकारें और उनका नेतृत्व करने वाले बधाई के पात्र हैं. हमारा दायित्व है, अच्छाई को लेकर आगे बढ़ें और अच्छा करने का प्रयास करें.

ये मन में भाव रहा, तो देशवासियों को निराश होने की नौबत नहीं आएगी. मैं ज्यादा टीवी और अखबार नहीं देख पाता. लोग चुनाव का अलग अलग ढंग से मूल्यांकन करेंगे. अगर देशवासियों ने हंग पार्लियामेंट बनाई होती. फ्रैक्चर्ड मैंडेट दिया होता, तो ये कह सकते थे कि सरकार के प्रति सिर्फ गुस्से का कारण था या एंटी इस्टैबलिशमेंट था.

लेकिन भारतीय जनता पार्टी को संपूर्ण बहुमत देने का मतलब होता है कि लोगों ने आशा और विश्वास का मतदान किया है. यह पूरा जनादेश उम्मीद से है. आपको याद होगा जब 2013 में तालकटोरा स्टेडियम में हमारी राष्ट्रीय परिषद मिली थी, तब मैंने कहा था कि यह चुनाव आशा का चुनाव है. उस दिन मेरे मुंह से एक बात निकली थी. मैं सभी को याद दिलाना चाहता हूं. मैंने कहा था कि हम चलें या न चलें, देश चल पड़ा है. आज जब हम इतनी बड़ी संख्या में सेंट्रल हॉल बीजेपी के समर्पित सेनानियों से भरा पड़ा है. उसका कारण, देश चल पड़ा है, हम चलें या न चलें.

ये उमंग, ये उत्साह चलता रहेगा. जिम्मेदारी का युग शुरू होता है. इस सभागृह में मेरी तरह बहुत से लोग होंगे. जो आजाद हिंदुस्तान में पैदा हुए. पहली बार आजाद हिंदुस्तान में पैदा हुए शख्स के नेतृत्व में सरकार बनेगी.

हम देश की आजादी के लिए जूझ नहीं पाए. मगर अब हमें देश के लिए जीने का सौभाग्य मिला है.

भाइयों बहनों, मैं स्वभाव से आशावादी व्यक्ति हूं. डीएनए में लिखा है. पता नहीं निराशा क्या होती है. यहां एक कॉलेज में भाषण हुआ था तो एक बात कही थी. आज फिर कह रहा हूं. ये गिलास आधा पानी और आधा हवा से भरा है.

सकारात्मक मार्ग के लिए आशावादी होना बहुत बड़ी आवश्यकता है. आशावादी व्यक्ति ही देश में आशा का संचार कर सकते हैं. संकट आते हैं. किस पर नहीं आए इस जीवन में. 2001 में गुजरात में भयंकर भूकंप आया. पूरा विश्व मानता था कि अब गुजरात खत्म. देखते ही देखते वह खड़ा हो गया और दौड़ पड़ा. मैं देश को बताना चाहता हूं. पुराने अनुभव कितने ही बुरे क्यों न हों. निराशा छोड़नी होगी.

दुनिया का इतना बडा़ और जागरुक लोकतंत्र. ये अगर फैसला करे तो कहां से कहां पहुंच सकता है. सवा सौ करोड़ देशवासी एक कदम चलें, तो हम सवा सौ करोड़ कदम आगे बढ़ जाएंगे. कहां हैं छह ऋतुएं. कहां है इतनी विविधता. हमें सिर्फ मौका देना है. शक्ति भरी पड़ी है लोगों में.

इस चुनाव में हम लोगों ने दो बातों पर बहुत बल दिया. उन्हें आगे बढ़ाना है. सबका साथ, सबका विकास. हम सबका विकास चाहते हैं. लेकिन सबका साथ उतना ही अनिवार्य है. उस मंत्र को लेकर हम आगे बढ़ना चाहते हैं.

ये चुनाव एक नई आशा का चुनाव है. ऐसे सामर्थ्यवान साथियों के साथ और वरिष्ठ नेताओं के मार्गदर्शन से पिछला दायित्व पूरा किया. आज मैं आपको यकीन दिलाता हूं 2019 में मैं फिर अपना रिपोर्ट कार्ड दूंगा. देश के लिए जिऊंगा. ये सरकार गरीबों को समर्पित है. करने के इरादे से बैठे हुए हैं. उनके लिए है. 2015-2016, हम सबके जीवन में एक महत्वपूर्ण अवसर आ रहा है. पंडित दीनदयाल उपाध्याय का शताब्दि वर्ष आ रहा है. चरैवेति चरैवेति का मंत्र. जिससे त्याग तपस्या की व्यवस्था विकसित हुई. पंडित जी का शताब्दी पर्व कैसे हो. सामान्य व्यक्ति के जीवन में शुचिता का आग्रह कैसे हो. उनके जीवन में विचार से ज्यादा ताकत आचार की थी. आचार परमो धर्म. पंडित दीनदयाल जी के शताब्दी पर्व के लिए पार्टी सोचे, सरकार सोचे, दरिद्र नारायण की सेवा. अंत्योदय. ये पंडित जी ने हमें दिए हुए हैं. दीनदयाल जी के शताब्दी वर्ष में सरकार उनका सपना सच करेगी.

वैश्विक परिवेश में भारत के इस चुनाव नतीजे को सकारात्मक रूप से देखा जा रहा है. विश्व में भारत का रुतबा पैदा हो रहा है. देश के कोटि कोटि जनों ने किसी दल की सरकार या किसी व्यक्ति को प्रधानमंत्री बनाया हो, ऐसा नहीं है. यह जनादेश देकर उन्होंने देश का मान ऊंचा कर दिया. ये वो नतीजे हैं, जो विश्व को भारत की लोकतांत्रिक सामर्थ्य की तरफ आकर्षित करते हैं. इस नतीजे से विश्व की मानवतावादी शक्तियों में हिम्मत बढ़ी है.

ये जो मोदी आपको दिख रहा है. इसलिए नहीं कि बहुत बड़ा है. इसलिए दिख रहा कि मेरी पार्टी के वरिष्ठ नेताओँ ने मुझे अपने कंधे पर बैठाया है. ये विजय, कभी हम गलती न करें. देखिए मुझे टिकट मिला तो जीत गया, उसे मिलता तो न जीतता. आज हमने जो भी पाया है. पांच पांच पीढ़ी के तप के बाद पाया है. जब जनसंघ लोगों को समझ नहीं आता था कि ये कौन हैं. धार्मिक हैं कि सामाजिक हैं. दीवारों पर दिया जलाने में खपे परिवार. मैंने आज उन सभी पीढ़ियों को नतमस्तक होकर नमन करता हूं.

हम भी न भूलें. हम आज अपने कारण यहां नहीं हैं. उनकी तपस्या के कारण हैं. अगर इतना सा मन में हमेशा बना रहा तो हमें कभी भी समाज के लिए दल के लिए साथियों के लिए नीचा नहीं होना पड़ेगा.

फिर एक बार आडवाणी जी ने आशीर्वाद दिया. आप लोगों ने जिम्मेदारी दी. मैं पूरी कोशिश करूंगा कि आपकी अपेक्षाओं पर कभी भी नीचा देखने का अवसर नहीं आएगा.

Friday, 16 May 2014


भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदीजी को .हार्दिक शुभकामनाए..


भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदीजी को बहोत-बहोत बधाई...

Friday, 9 May 2014

भारत के शौर्य और स्वाभिमान के प्रतिक महाराणा प्रताप को जन्म-दिन पर कोटि-कोटि नमन...